
तुमसे मिल कर वापस लौट रहा हूँ मैं,
दौड़ कर मोहल्ले तक की बस ली है
हांफता हुआ सा खिड़की के पास बैठा बेशक़
मगर पड़ा हुआ हूँ आधा कहीं तेरे पास |
न जागा हूँ, न सोया हूँ,
तुम ये कैसे हालात दे गयी?
हम ने प्यार में पड़के तुम्हे शह क्या दिया,
तुम मुस्कुराकर हूमें मात दे गयी|
नहीं जानता हूँ मैं उलझी बातें,
सीधी-सुलझी बातें करता हूँ|
घर बना बैठा हूँ दिल का
तेरे आखों के आस-पास कहीं|
जिन्हें शब्दों में मैं क़ैद नही कर सकता,
कुछ वैसी सी तुम मुझे बात दे गयी|
हम ने प्यार में पड़के तुम्हे शह क्या दिया,
तुम मुस्कुराकर हूमें मात दे गयी|
क्या है मेरा, क्या नहीं है,
कौन ठहरेगा, और कौन बेह जाएगा
वक़्त की लहरों में, बन एक मुसाफ़िर
नहीं जानता हूँ मैं, नहीं माँगता हूँ मैं|
फ़िर वही बचपन के उतावलेपन से भरी
तुम मुझ आशिक़ को इश्क़ की रात दे गयी,
हम ने प्यार में पड़के तुम्हे शह क्या दिया,
तुम मुस्कुराकर हूमें मात दे गयी|